कटनी में इंजीनियरिंग का कमाल: 18 साल बाद तैयार हुई भारत की सबसे लंबी भूमिगत जल सुरंग
कटनी। मध्य प्रदेश के कटनी जिले में स्थित 11.9 किलोमीटर लंबी स्लीमनाबाद टनल का निर्माण आखिरकार 18 साल बाद पूरा हो गया है। यह भारत की सबसे लंबी भूमिगत जल परिवहन (Water Conveyance) सुरंग है, जिसके जरिए पहली बार नर्मदा नदी का पानी सोन नदी बेसिन तक पहुंचेगा। 14 जुलाई को टनल के दोनों सिरों के बीच मौजूद आखिरी चट्टान हटने के साथ यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई।
यह सुरंग बर्गी डायवर्जन परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके माध्यम से बर्गी जलाशय का पानी बिना किसी पंप के केवल गुरुत्वाकर्षण (Gravity Flow) के सहारे विंध्य क्षेत्र और सोन नदी बेसिन तक पहुंचाया जाएगा। टनल बोरिंग मशीन (TBM) को हटाने के बाद इसमें पानी छोड़ा जाएगा।
परियोजना पूरी होने के बाद जबलपुर, कटनी, सतना, मैहर, रीवा और पन्ना जिलों के करीब 1,450 गांवों की लगभग 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ मिलेगा। इससे सूखा प्रभावित विंध्य क्षेत्र में खेती को नई मजबूती मिलेगी।
कठिन भूगर्भीय चुनौतियों के बीच बना रिकॉर्ड
सुरंग का निर्माण वर्ष 2008 में शुरू हुआ था, लेकिन कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों के कारण काम में लगातार देरी होती रही। इंजीनियरों को संगमरमर, चूना पत्थर और डोलोमाइट जैसी कठोर चट्टानों को काटना पड़ा। इसके अलावा भूमिगत पानी का तेज बहाव, अस्थिर चट्टानें, बड़ी-बड़ी प्राकृतिक गुफाएं और कार्बन डाइऑक्साइड गैस जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा।
इन परिस्थितियों में टनल बोरिंग मशीनों (TBM) के कटर हेड बार-बार क्षतिग्रस्त होते रहे। 2011 में लगाई गई पहली मशीन चार वर्षों में केवल 1.4 किलोमीटर खुदाई ही कर सकी। बाद में 2016 में दूसरी जर्मन निर्मित TBM को दूसरी ओर से लगाया गया। दोनों तरफ से एक साथ खुदाई, आधुनिक ग्राउटिंग तकनीक और हाई-कैपेसिटी डी-वॉटरिंग जैसी तकनीकों की मदद से आखिरकार परियोजना सफल हुई।
लागत दोगुनी, लेकिन मिलेगा बड़ा लाभ
निर्माण में देरी के कारण परियोजना की लागत 799 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 1,600 करोड़ रुपये हो गई। यह सुरंग जमीन से 20 से 40 मीटर नीचे होकर गुजरती है और इसके ऊपर राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे ट्रैक तथा आबादी वाले क्षेत्र होने के बावजूद सतह पर किसी तरह का असर नहीं पड़ा।
इस परियोजना को इंजीनियरिंग का एक बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। लोककथाओं में कहा जाता है कि नर्मदा और सोन, जो मैकल पर्वत से निकलती हैं, कभी मिल नहीं सकीं। अब आधुनिक इंजीनियरिंग ने वह कर दिखाया है, जो किंवदंती के अनुसार कभी संभव नहीं था—नर्मदा का जल पहली बार सोन नदी बेसिन तक पहुंचेगा।
