पांढुर्ना के गोटमार मेले में 626 घायल
पांढुर्णा का ऐतिहासिक गोटमार मेला इस बार भी अपनी अनोखी परंपरा और भारी भीड़ के चलते चर्चा में रहा। पोला पर्व के अगले दिन आयोजित होने वाले इस मेले में पांढुर्णा और सावरगांव के लोग जाम नदी के दोनों किनारों पर एकत्रित हुए। सुबह से ही नदी के आसपास लोगों की आवाजाही बढ़ने लगी थी और दोपहर तक हजारों की संख्या में श्रद्धालु और दर्शक मौके पर पहुंच चुके थे।
मेले की शुरुआत चंडी माता की पूजा-अर्चना और पारंपरिक पलाश ध्वज की रस्म के साथ हुई। इसके बाद सदियों से चली आ रही गोटमार की परंपरा निभाई गई। इस आयोजन को देखने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग पहुंचे। करीब चार हजार से अधिक प्रतिभागियों के साथ बड़ी संख्या में दर्शकों की मौजूदगी ने पूरे क्षेत्र में मेले जैसा माहौल बना दिया।
हालांकि, परंपरा के दौरान हुई पत्थरबाजी के कारण बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए। शाम तक 626 से अधिक लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई। इनमें 28 गंभीर घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि 7 लोगों को बेहतर उपचार के लिए नागपुर रेफर किया गया। घायलों में सिर, आंख, नाक और पैरों में चोट के मामले सामने आए।
मेले को लेकर प्रशासन ने सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए पुलिस बल, मेडिकल कैंप और अस्पतालों में अतिरिक्त इंतजाम किए थे। कलेक्टर नीरज वशिष्ठ और पुलिस प्रशासन की टीम पूरे आयोजन पर नजर बनाए रही। क्षेत्रीय विधायक निलेश उइके भी मेले में शामिल हुए और पांढुर्णा पक्ष की ओर से परंपरा में भाग लिया।
शाम करीब 5 बजे पांढुर्णा पक्ष ने पलाश ध्वज को काटने में सफलता हासिल की, लेकिन उसे अपने क्षेत्र में ले जाना संभव नहीं हो सका। इसके बाद दोनों गांवों के वरिष्ठ खिलाड़ियों ने मिलकर ध्वज को निकाला और चंडी माता मंदिर में समर्पित कर दिया। इसी के साथ मेले की परंपरागत रस्म पूरी हुई।
गोटमार मेला स्थानीय लोगों की आस्था और वर्षों पुरानी लोकपरंपरा से जुड़ा आयोजन है। वहीं, हर साल होने वाली चोटों को देखते हुए इस परंपरा को सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ाने को लेकर भी चर्चा लगातार बनी हुई है।
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